बाँदा

बांदा जिले का इतिहास भारत के प्राचीनतम एतिहासिक सन्दर्भों में अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। यहाँ पाषाण काल के मानव निर्मित प्रस्तर औजार, निवास आदि के स्पष्ट प्रमाण प्राप्त हुये हैं। ऋग्वेदकाल में आर्यो नें भी इस स्थान को अपने निवास हेतु चुना था। बादा नगर का नामकरण महर्षि बामदेव के नाम पर हुआ था। प्राचीन काल मे इसे बाम्दा के नाम से जाना जाता था । जो कि अपभ्रंश होते हुये बांदा हो गया । भगवान श्री राम के द्वारा अपने वनवास काल मे चित्रकूट में विताये गये समय मे बांदा के क्षेत्र मे प्रवास करने के उल्लेख है। कालान्तर में पुष्यमित्र शुंग एवं हर्षवर्धन जैसे प्रमुख शासकों के शासन का यह क्षेत्र महत्वपूर्ण भू भाग रहा था। ह्वेनसांग के विवरण मे इसका उल्लेख मिलता है। चंदेल वंश के शासको द्वारा भी दीर्घावधि शासन किया गया। इसी दौरान निर्मित अजेय कालिजर दुर्ग भारत के महत्वपूर्ण सामरिक दुर्ग का निर्माण हुआ था । शेरशाह सूरी का कालिंजर युद्ध एक महत्वपूर्ण एतिहासिक घटना हैं। अग्रेजी व्यवस्था में1819 में बांदा जिले को दक्षिणी बुंदेलखण्ड का मुख्यालय बनाया था। 1857 कें स्वतंत्रता संग्राम में नबाब अली बहादुर का योगदान उल्लेखनीय है। भूरागढ कां किल 800 कातिकारियों की संघर्ष गाथा का गवाह है। बादाँ जिले में लाला लाजपतराय तथा महात्मा गाधी के द्वारा भी प्रवास किया गया । केन नदी जिसका प्राचीन नाम कर्णावती था बांदा नगर से होकर बहती है। प्रसिद्ध ” नदी जोड़ो परियोजना में केन वेतवा लिंक को प्रथम चयन किया गया था। केन नदी में प्राप्त होने वाला अद्भुत ” शजर” पत्थर प्राकृतिक चित्रकारी के दुर्लभ उदाहरण हैं। वर्तमान में बुंदेलखंड एक्स्प्रेस वें एवं डिफेंस कारडोर के अंतर्गत होने से क्षेत्रीय विकास एवं जन समृद्धि के नये अवसर उपलब्ध हो रहे हैं ।